
.....और वो दिन आ गया जब,
किसी के न चाहने के विपरीत,
मैं इस धरा पर आ ही गई।
आते ही मायूस स्वर 'लड़की हुई है'
मेरे कोमल अवचेतन मन पर
पहला कठोर प्रहार!
सिर्फ़ भइया को क्यूँ
मुझे भी एक रोटी और दो न।
'चुप कर! वो लड़का है'
मेरे उत्सुक मन पर
दूसरा कठोर प्रहार!
'अरे कहाँ मर गई!'
सास का ताना।
'तुम तो बड़ी मूर्ख हो!'
पति की अवहेलना।
अनेकोनेक कठोर प्रहारों से बीधित
सदियों से दबी कुचली...
अपनी लाश अपने ही कन्धों पर धोते
यही हमारी व्यथा है।
क्या यही हमारी नियति है?
कब आएगा वो नवयुग
..जब सारे आसमान में
कुछ टुकड़े हमारे भी होंगे।
..जब हमारे सहमे से चेहरों पर
विश्वास की झलक दिखलाई देगी।
..जब हर घूरती आंखों से
हम महसूस कर सकेंगी
अपने आपको सुरक्षित।
'प्रतीछा' बहुत लम्बी है
पर उम्मीद की रौशनी है,
आसमान के कुछ टुकड़े
हमारे ज़रूर होंगे।
