Sunday, October 4, 2009

प्रतीछा....




.....और वो दिन आ गया जब,


किसी के न चाहने के विपरीत,


मैं इस धरा पर आ ही गई।


आते ही मायूस स्वर 'लड़की हुई है'


मेरे कोमल अवचेतन मन पर


पहला कठोर प्रहार!



सिर्फ़ भइया को क्यूँ


मुझे भी एक रोटी और दो न।


'चुप कर! वो लड़का है'


मेरे उत्सुक मन पर


दूसरा कठोर प्रहार!



'अरे कहाँ मर गई!'


सास का ताना।


'तुम तो बड़ी मूर्ख हो!'


पति की अवहेलना।


अनेकोनेक कठोर प्रहारों से बीधित


सदियों से दबी कुचली...


अपनी लाश अपने ही कन्धों पर धोते


यही हमारी व्यथा है।


क्या यही हमारी नियति है?



कब आएगा वो नवयुग


..जब सारे आसमान में


कुछ टुकड़े हमारे भी होंगे।


..जब हमारे सहमे से चेहरों पर


विश्वास की झलक दिखलाई देगी।


..जब हर घूरती आंखों से


हम महसूस कर सकेंगी


अपने आपको सुरक्षित।



'प्रतीछा' बहुत लम्बी है


पर उम्मीद की रौशनी है,


आसमान के कुछ टुकड़े


हमारे ज़रूर होंगे।








कुछ दूर साथ चलना ही तो सहमति नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



नाम का बीच में आ जाना ही तो चर्चा नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



एक बार मुड़कर देख लेना ही तो नज़रे इनायत नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



चिंतित स्वर में बात करना ही तो फिक्र नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



सोचा न था...






चिडियों की चाह्चाहतों के बीच खामोशी ऐसी, सोचा न था


हंसते हंसते अचानक आँखों मैं पानी, सोचा न था




खुशनुमा बादलों के बीच धूप की चिलचिलाहट, सोचा न था


सपाट सड़कों पर चलते चलते अचानक अंधे मोड़, सोचा न था


सुहानी सुबह के बीच अचानक सूर्यग्रहण, सोचा न था


बारिश की बूंदों के बीच सूखे का आगाज़, सोचा न था

सकारात्मक सोचों के बीच नकारात्मक पहलू, सोचा न था.....