Thursday, October 13, 2011



मन मे अवसाद, उलझा हुआ मस्तिष्क, किँकर्तव्यमूढ से हम।

मन मे अवसाद, उलझा हुआ मस्तिष्क, किँकर्तव्यमूढ से हम।


अनेकोँनेक उमड़ते घुमड़ते नकारात्मक विचार।

विचलित ह्रदय, जैसे कुछ छूट रहा हो।

प्राण शरीर छोड़ रहा हो।


बहुत कुछ कहने की इच्छा, परन्तु शब्दोँ मेँ बाँध पाना मुश्किल..

निरर्थक अहम्, वाद विवाद, उत्तर प्रत्युत्तर

जानते हुये भी कि ' मूल' क्या है.,


कुछ छूटने का भयावह आभाष, खोने का भय..!

कुछ छूटने का भयावह आभास, खोने का भय..!


एहसास मात्र से ही कलेजा मुँह को आता है,

पैरोँ मेँ सिहरन, जैसे रक्त जम सा गया हो..


जानते हुये भी कि ये मूल हमारा 'प्यार' है, हमारा जीवन है..

या शायद उससे भी बहुत ज्यादा!!

Sunday, October 4, 2009

प्रतीछा....




.....और वो दिन आ गया जब,


किसी के न चाहने के विपरीत,


मैं इस धरा पर आ ही गई।


आते ही मायूस स्वर 'लड़की हुई है'


मेरे कोमल अवचेतन मन पर


पहला कठोर प्रहार!



सिर्फ़ भइया को क्यूँ


मुझे भी एक रोटी और दो न।


'चुप कर! वो लड़का है'


मेरे उत्सुक मन पर


दूसरा कठोर प्रहार!



'अरे कहाँ मर गई!'


सास का ताना।


'तुम तो बड़ी मूर्ख हो!'


पति की अवहेलना।


अनेकोनेक कठोर प्रहारों से बीधित


सदियों से दबी कुचली...


अपनी लाश अपने ही कन्धों पर धोते


यही हमारी व्यथा है।


क्या यही हमारी नियति है?



कब आएगा वो नवयुग


..जब सारे आसमान में


कुछ टुकड़े हमारे भी होंगे।


..जब हमारे सहमे से चेहरों पर


विश्वास की झलक दिखलाई देगी।


..जब हर घूरती आंखों से


हम महसूस कर सकेंगी


अपने आपको सुरक्षित।



'प्रतीछा' बहुत लम्बी है


पर उम्मीद की रौशनी है,


आसमान के कुछ टुकड़े


हमारे ज़रूर होंगे।








कुछ दूर साथ चलना ही तो सहमति नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



नाम का बीच में आ जाना ही तो चर्चा नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



एक बार मुड़कर देख लेना ही तो नज़रे इनायत नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



चिंतित स्वर में बात करना ही तो फिक्र नही होती,


सिर्फ़ मुस्कुराना ही तो खुशी नही होती।



सोचा न था...






चिडियों की चाह्चाहतों के बीच खामोशी ऐसी, सोचा न था


हंसते हंसते अचानक आँखों मैं पानी, सोचा न था




खुशनुमा बादलों के बीच धूप की चिलचिलाहट, सोचा न था


सपाट सड़कों पर चलते चलते अचानक अंधे मोड़, सोचा न था


सुहानी सुबह के बीच अचानक सूर्यग्रहण, सोचा न था


बारिश की बूंदों के बीच सूखे का आगाज़, सोचा न था

सकारात्मक सोचों के बीच नकारात्मक पहलू, सोचा न था.....

Thursday, August 20, 2009

Kya Likhun..

...hmm I dont know how and when it came in my mind that I should write something on various social issues around us but trully speaking I never tried. It was fear of writing or fear of writing impressive... I was unable to figure it out. It was my childhood days, when I thought that I should came in mainstream of social issues and causes but how? That was really a big question for me. My family is very simple family. No one never wrote anything exept my eldest bhaiya. Sometimes he might write his diary or poems... something like that.. though he never told me. Its my guess only. Everyone is a big thinker in family but may be they feel like me. I can understand... empathetic approach! In my school, college and office people around me always told me ...Anuj, why u dont write something. Tum likh sakte ho yaar.... but again same.. a BIG HOW?