
मन मे अवसाद, उलझा हुआ मस्तिष्क, किँकर्तव्यमूढ से हम।
मन मे अवसाद, उलझा हुआ मस्तिष्क, किँकर्तव्यमूढ से हम।
अनेकोँनेक उमड़ते घुमड़ते नकारात्मक विचार।
विचलित ह्रदय, जैसे कुछ छूट रहा हो।
प्राण शरीर छोड़ रहा हो।
बहुत कुछ कहने की इच्छा, परन्तु शब्दोँ मेँ बाँध पाना मुश्किल..
निरर्थक अहम्, वाद विवाद, उत्तर प्रत्युत्तर
जानते हुये भी कि ' मूल' क्या है.,
कुछ छूटने का भयावह आभाष, खोने का भय..!
कुछ छूटने का भयावह आभास, खोने का भय..!
एहसास मात्र से ही कलेजा मुँह को आता है,
पैरोँ मेँ सिहरन, जैसे रक्त जम सा गया हो..
जानते हुये भी कि ये मूल हमारा 'प्यार' है, हमारा जीवन है..
या शायद उससे भी बहुत ज्यादा!!

No comments:
Post a Comment